Bihar Gram Panchayat Tax Rules 2026 : बिहार सरकार ने ग्रामीण स्वशासन को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। 15 जुलाई 2026 को कैबिनेट की बैठक में ‘ग्राम पंचायत टैक्स, रेट्स और फीस नियम, 2026’ को मंजूरी दी गई। इसके साथ ही पंचायतों के परिसीमन को लेकर भी बड़ा फैसला लिया गया है। आइए, इन दोनों बड़े बदलावों को विस्तार से और आसान भाषा में समझते हैं।
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पहला बड़ा बदलाव : अब गांवों में भी लगेगा टैक्स
बिहार के ग्रामीण इलाकों में अब तक पंचायतों के पास टैक्स वसूलने का अधिकार तो था, लेकिन इसके लिए कोई ठोस नियम नहीं थे। अब सरकार ने ‘ग्राम पंचायत टैक्स, रेट्स और फीस नियम, 2026’ बनाकर यह स्पष्ट कर दिया है कि किस पर, कितना और किस तरह का टैक्स लगेगा।
क्यों उठाया गया यह कदम?
सबसे बड़ा मकसद है – ग्राम पंचायतों को आत्मनिर्भर बनाना। अब तक पंचायतें सरकारी अनुदान (ग्रांट) पर निर्भर थीं। नए नियम से पंचायतें अपना खुद का राजस्व (OSR – Own Source Revenue) बढ़ा सकेंगी और गांव के विकास के लिए खुद पैसा जुटा सकेंगी।
सरकार का अनुमान है कि इस नई व्यवस्था से राज्य के करीब 45,000 राजस्व गांवों से ₹1,300 करोड़ से अधिक का अतिरिक्त राजस्व मिलेगा। यह पैसा सीधे ग्राम पंचायतों के पास जमा होगा और गांव के विकास में खर्च होगा।
किसे, कितना टैक्स देना होगा? – पूरी डिटेल

1. घरों पर टैक्स (होल्डिंग टैक्स)
सरकार ने घरों को तीन श्रेणियों में बांटा है – कच्चा, अर्ध-पक्का और पक्का। गरीबों पर बोझ न डालने के लिए कच्चे मकानों को पूरी तरह छूट दी गई है।
- मकान का प्रकार सालाना टैक्स (₹ में)
- कच्चा मकान पूरी तरह छूट (₹0)
- अर्ध-पक्का मकान ₹50
- पक्का मकान ₹100
- प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) के मकान ₹25 (रियायती दर)
खास बात: PMAY के तहत बने मकानों पर सिर्फ ₹25 सालाना टैक्स रखा गया है, ताकि गरीब परिवारों पर अतिरिक्त बोझ न पड़े।
2. व्यवसायों और दुकानों पर शुल्क
व्यापारियों, उद्यमियों और बड़े प्रतिष्ठानों को भी सालाना शुल्क देना होगा। दरें इस प्रकार हैं:
· पेट्रोल पंप, LPG एजेंसी, ईंट-भट्ठा, सिनेमा हॉल, होटल, विवाह भवन – ₹5,000 सालाना
· साप्ताहिक बाजार (हाट), दुकानें, कुटीर उद्योग – पंचायतें उचित शुल्क तय कर सकेंगी
· विज्ञापन, बिलबोर्ड, होर्डिंग्स – इन पर भी शुल्क लगाया जा सकता है
3. सेवा शुल्क (सफाई और पानी)
ग्रामीणों को मिलने वाली बुनियादी सेवाओं के लिए भी बहुत ही कम शुल्क रखा गया है:
· सफाई शुल्क – ₹25 सालाना
· पानी की आपूर्ति शुल्क – ₹25 सालाना
इसका मतलब है कि सालाना सिर्फ ₹50 देकर ग्रामीण सफाई और पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं का लाभ उठा सकते हैं।
टैक्स से मिलने वाला पैसा कहां खर्च होगा?
पंचायतों द्वारा वसूला गया पूरा पैसा सीधे ग्राम पंचायत के कोष में जमा होगा। इसका इस्तेमाल सिर्फ और सिर्फ गांव के विकास कार्यों के लिए किया जा सकेगा, जैसे:
· ग्रामीण सड़कों का निर्माण और मरम्मत
· नाली और जल निकासी व्यवस्था में सुधार
· सफाई और स्वच्छता अभियान
· पीने के पानी की व्यवस्था को बनाए रखना
· गांव के सामुदायिक भवन, पार्क, आंगनबाड़ी केंद्र आदि की देखभाल
यानी, ग्रामीण जो टैक्स देंगे, वही पैसा उन्हीं के गांव में विकास के रूप में वापस आएगा।
इस फैसले पर क्यों है सियासी हंगामा?
जैसे ही यह फैसला आया, राजनीतिक गलियारों में जमकर बहस छिड़ गई। विपक्ष और सरकार आमने-सामने आ गए।
विपक्ष का विरोध – “ग्रामीणों पर अतिरिक्त बोझ”
RJD, AIMIM, CPI(ML) जैसे विपक्षी दलों ने विधानसभा में इस फैसले का जमकर विरोध किया। उनका तर्क है कि :
· महंगाई के इस दौर में ग्रामीणों पर कर का अतिरिक्त बोझ डालना गलत है।
· RJD सांसद सुधाकर सिंह ने इसे “जज़िया कर” (एक प्रकार का जबरन कर) कहकर संबोधित किया।
· लोजपा (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान ने भी इसका विरोध किया और कहा कि सरकार को पहले गांवों में बुनियादी सुविधाएं मुहैया करानी चाहिए।
सरकार का समर्थन – “पंचायतों को आत्मनिर्भर बनाना जरूरी”
सरकार ने स्पष्ट किया है कि :
· यह कदम 16वें वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुरूप है।
· गरीबों पर कोई बोझ नहीं डाला गया है – कच्चे मकान और PMAY के मकानों को छूट/रियायत दी गई है।
· पंचायतों को आर्थिक रूप से मजबूत करने से ग्रामीण विकास को गति मिलेगी।
· पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश ने कहा कि टैक्स से जुटा पैसा सीधे गांवों में खर्च होगा, इसलिए इसे बोझ नहीं बल्कि निवेश समझना चाहिए।
दूसरा बड़ा बदलाव – पंचायतों का नया परिसीमन
टैक्स के फैसले के साथ ही कैबिनेट ने ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद की सीमाओं (Delimitation) को नए सिरे से तय करने को भी मंजूरी दी।
आखिर परिसीमन क्यों जरूरी था?
बिहार में पिछली बार 1993-94 में पंचायतों का परिसीमन हुआ था। तब से आबादी में काफी बदलाव आया है। अब नए परिसीमन से हर पंचायत में आबादी लगभग बराबर हो जाएगी, जिससे विकास कार्य बेहतर तरीके से हो सकेंगे।
नए परिसीमन के प्रमुख नियम
- आधार: 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर परिसीमन होगा।
जनसंख्या मानदंड:
- ग्राम पंचायत – लगभग 7,000 की आबादी पर एक पंचायत
- पंचायत समिति सदस्य – 5,000 आबादी पर एक सीट
- जिला परिषद सदस्य – 50,000 आबादी पर एक सीट
- वार्ड – 500 आबादी पर एक वार्ड
- नामकरण: अब पंचायत का नाम उसी गांव के नाम पर रखा जाएगा, जहां पंचायत का मुख्यालय होगा। मुख्यालय वही गांव होगा जिसकी आबादी सबसे अधिक है।
अपवाद: अगर किसी पंचायत क्षेत्र में SC/ST/OBC की आबादी 50% से अधिक है, तो मुख्यालय उस गांव में होगा जहां इन वर्गों की आबादी सबसे अधिक है।
- सीमा निर्धारण: गांवों की सीमाएं प्राकृतिक (नदी, नाला) या भौगोलिक (सड़क, रेलवे लाइन) होंगी। एक गांव को दो पंचायतों में नहीं बांटा जाएगा, सिवाय अत्यंत आवश्यक स्थिति के।
परिसीमन से पंचायत चुनावों पर क्या असर पड़ेगा?
यह पूरी प्रक्रिया काफी लंबी है। अधिकारियों के अनुसार, परिसीमन पूरा होने में 7 से 8 महीने लग सकते हैं। इस कारण, 2026 के अंत में होने वाले पंचायत चुनावों में देरी हो सकती है और ये चुनाव 2027 के मध्य तक खिसक सकते हैं।
क्या यह टैक्स बिहार के लिए नई बात है?
बिल्कुल नहीं! बिहार पंचायत राज अधिनियम, 2006 की धारा 27 में पहले से ही पंचायतों को टैक्स वसूलने का अधिकार दिया गया था। लेकिन तब तक इसके नियम नहीं बने थे। अब सरकार ने उन नियमों को अंतिम रूप दे दिया है।
ताजा अपडेट – विधेयक पारित
22-23 जुलाई 2026 को बिहार विधानसभा में ‘बिहार पंचायत राज (संशोधन) विधेयक, 2026’ पारित कर दिया गया है। इसके साथ ही ये सभी नियम कानूनी रूप से पूरी तरह लागू हो गए हैं। अब पंचायतों को टैक्स वसूलने के लिए किसी और अनुमति की आवश्यकता नहीं है।
निष्कर्ष – क्या यह बदलाव सही दिशा में है?
बिहार सरकार के ये दोनों फैसले – टैक्स वसूली का अधिकार और परिसीमन – ग्रामीण स्वशासन को मजबूत करने की दिशा में बड़े कदम हैं। हालांकि विपक्ष इसे ग्रामीणों पर बोझ बता रहा है, लेकिन सरकार का तर्क है कि यह पंचायतों को आत्मनिर्भर बनाने और गांवों का विकास करने का एक कारगर तरीका है।
आम ग्रामीण के लिए:
· अगर आप कच्चे मकान में रहते हैं – कोई टैक्स नहीं
· अगर आप PMAY के मकान में रहते हैं – सिर्फ ₹25 सालाना
· अगर आप पक्के मकान में रहते हैं – ₹100 सालाना
· सफाई और पानी के लिए – ₹50 सालाना
यानी, एक आम ग्रामीण परिवार पर सालाना अधिकतम ₹150 का ही अतिरिक्त बोझ आएगा, जबकि बदले में उसे बेहतर सड़क, पानी, सफाई और विकास की सुविधाएं मिलेंगी।
अब देखना यह होगा कि पंचायतें इस पैसे का कितना सही इस्तेमाल करती हैं और क्या यह फैसला वाकई में बिहार के गांवों की तस्वीर बदल पाता है।









